कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?
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जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी
यूँ ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता ...
Monday, November 03, 2008
मेरे चांद के तुकड़े
ख़ुदा ने चिंघाड़ते कहा - अरे बस भी करो कम्बख़्तों, सब मिलकर चांद की मां बेहन एक करने पर तुले हुए हो? अगर एक-एक करके सभी इंसान चांद पर चले गए तो वहां भी सीमाएं बनालोगे फिर ऊंच-नीच ज़ात-पात कहीं मंदिर कहीं मस्जिद वहां भी फ़साद मचाओगे।
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