कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?
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जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी
यूँ ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता ...
Thursday, July 17, 2008
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2 टिप्पणियाँ:
ye sacch main bahut accha hai ...aap ka shukriya..
बडा विहंगम दृष्य है, आभार.
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