कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?
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जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी
यूँ ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता ...
Wednesday, January 07, 2009
चाहे राम बोलो या रहीम बोलो
जब इरादे हों पक्के और जज़बात भी हों सच्चे तो काम्याबी ख़ुद चलकर क़दम चूमे......... आगे और भी है
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